Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
मायैषा सा ह्यविद्यैषा भावनैषा भयावहा ।
संविदस्तन्मयत्वं यत्तत्कर्मेति विदुर्बुधाः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, अपवित्र, असद्रूप, मोह में डालनेवाले, भय के कारण, प्रतीतिमात्र
सिद्ध विशाल आकार के दृश्य को आप अपना बन्धन समझिये ॥ ३ ६॥ यह द्रश्य माया है, अविद्या है, भय
देनेवाली भावना है। मन की जो दृश्यमयता है, विद्वान लोग उसीको बन्धन में डालनेवाला कर्म कहते
हैं