Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
यादृशं भावमादत्ते दृढाभ्यासवशान्मनः ।
तथा स्पन्दाख्यकर्माख्यप्रथाशाखा विमुञ्चति ॥ २० ॥
तथा क्रियां तत्फलतां निष्पादयति चादरात् ।
ततस्तमेव चास्वादमनुभूयाशु बध्यते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार वासना, कर्म ओर उसके फलरूप अनुभवों की भी समान रूप होने से एक ही सत्ता है,
ऐसा कहते हैं।
दृढ़ाभ्यास होने के कारण मन जैसे भाव का ग्रहण करता हैं वैसे ही स्पन्दनाम की, कर्मनाम की
शाखाओं को पैदा करता है, वैसे ही क्रियारूप उसके फल को बड़े आदर से उत्पन्न करता है, तदनन्तर
उसी के स्वाद का अनुभव कर शीघ्र बन्धन में पड़ता है