Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
मुक्तौ तु नान्यथा प्राप्तिरिति भावितचेतसः ।
स्वां दृष्टिं प्रविवृण्वन्ति स्वैरेव नियमभ्रमैः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हमारे उपाय के बिना किसी को भी मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती, इस प्रकार के निश्चय से युक्त
चित्तवाले वे अपने द्वारा कल्पित नियमों से अपनी कल्पना का व्याख्यान करते हें । नियम भ्रम इससे
यह सूचित किया कि वेदान्तियों का एकमात्र उपाय तत्त्व ही वास्तविक है, उपाय आदि की प्रक्रियाएँ
तो पाणिनिजी की तरह कल्पित ही है