Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verses 41–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, verses 41–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 41,42
संस्कृत श्लोक
स्वयमुत्पद्यते सा च संकल्पाद्व्योमवृक्षवत् ।
असंकल्पनमात्रेण भावनायां महामते ॥ ४१ ॥
क्षीणायां स्वरसादेव विमर्शेन विलासिना ।
असंसङ्गः पदार्थेषु सर्वेषु स्थिरतां गतः ॥ ४२ ॥
सत्यदृष्टौ प्रपन्नायामसत्ये क्षयमागते ।
निर्विकल्पचिदच्छात्मा स आत्मा समवाप्यते ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश में वृक्ष की
तरह संकल्प से वह अविद्या स्वयं उत्पन्न होती है । हे महामते, भावना के असंकल्पमात्र से उस के
समाधि के अभ्यास से दृढ़ श्रवण, मननरूप विचार से अपने-आप क्षीण होने पर सब पदार्थों में
अनासक्ति स्थिर हो जाती है