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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

अभव्यया भावनया न चित्तेन्द्रियदृष्टिभिः । आत्मनोऽनन्यभूताभिरपि यः परिवर्जितः ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

न तो अकल्याणकारिणी भावना से और न चित्त, इन्द्रियदृष्टियों से जिसकी उपलब्धि होती है, जैसे आकाश अनन्त मेघपंक्तियों से रहित है, वैसे ही जो अपने से अपृथक्‌ अनन्त वासनाओं से रहित है