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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verses 53–54

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, verses 53–54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 53,54

संस्कृत श्लोक

क्षणादसत्तामायान्ति सत्तामपि पुनः क्षणात् । मातैव गृहिणीभावगृहीता कण्ठलम्बिनी ॥ ५३ ॥ करोति गृहिणीकार्यं सुरतानन्ददा सती । कान्तैव मातृभावेन गृहीता कण्ठलम्बिनी ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

माता ही यदि गृहिणी के भाव से गृहीत होकर गले लगती है, तो सुरतानन्द देनेवाली गृहिणी का कार्य करती है। स्त्री ही मातृभाव से गृहीत होकर यदि गले लगती है, तो, मातृभाववश कामदेव को निश्चित भूला देती है