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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verses 49–51

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, verses 49–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 49-51

संस्कृत श्लोक

तत्तत्कल्पनयातीतं तत्सुखायैव कल्पते । शून्य एव कुसूले तु सिंहोऽस्तीति भयं यथा ॥ ४९ ॥ शून्य एव शरीरेऽन्तर्बद्धोऽस्मीति भयं तथा । शून्य एव कुसूले तु प्रेक्ष्य सिंहो न लभ्यते ॥ ५० ॥ तथा संसारबन्धार्थः प्रेक्षितोऽसौ न लभ्यते । इदं जगदयं चाहमिति संभ्रान्तमुत्थितम् ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे कोठिले के सिंह आदि से रहित रहने पर भी इसमें सिंह है, ऐसा भय होता है, वैसे ही शून्य शरीर में भी मैं भीतर बद्ध हूँ, ऐसा भय होता है, जैसे खाली कोठिले में देखने पर सिंह नहीं मिलता, वैसे ही यह संसाररूपी बन्धन जब विचार पूर्वक देखा जाता है, तो प्राप्त नहीं होता ।” यह जगत्‌ है" “यह देहसंघात मैं हूँ” इस प्रकार का गाढ भ्रम ऐसे ही उत्पन्न हुआ है, जैसे बच्चों को मन्द-मन्द अन्धकार के समय वेताल के आकार की छाया दिखाई देती है