Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
वासनाभिरनन्ताभिर्व्योमेव घनराजिभिः ।
संदिग्धायां यथा रज्ज्वां सर्पतत्त्वं तथैव हि ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे यह रस्सी है या नहीं, इस प्रकार रस्सी में सन्देह होने पर सर्पत्वभ्रम
होता है वैसे ही बन्धनरहित चिदाकाशरूप आत्मा ने अपने में बन्धन की कल्पना कर रक्खी है