Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
बुद्धीन्द्रियेषु वल्गत्सु कर्मेन्द्रियगणस्ततः ।
स्फुरति स्वत एवोर्वी रजोलोल इवानिले ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानेन्द्रियों के आविर्भूत होकर अपने-अपने
विषय में प्रवृत्त होने पर उनसे कर्मेन्द्रियसमूह स्वतः ही ऐसे स्फुरित होता है, जैसे कि धूलिमिश्रित वायु
में पृथ्वी (तदन्तर्ग धूलिरूप पृथिवी) अपने-आप आविर्भूत होती है