Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 91
नब्बेवाँ सर्ग समाप्त इक्यानबेवाँ सर्ग भानु को मनु बनाकर ब्रह्मा की सृष्टि का और ऐन्दवों की सृष्टि के समान विश्व की मनोमात्रविलासता का निरूपण |
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- Verse 1भानु ने कहा : हे भगवन्, चूँकि भरत का शाप मनोनिग्रह में समर्थ नहीं हुआ, इसलिए मैं यह कहता…
- Verse 2इसलिए एेन्दवों की सृष्टियों का विनाश आप नहीं कर सकते, चूँकि आप महात्मा हैं, इसलिए आपके लि…
- Verse 3हे नाथ, इस संसार में ओर विविध संसारो में वह कौनसी वस्तु है, जो कि महात्मा ओर सबके स्वामी…
- Verses 4–5मन जगतों का कर्ता है, मन पुरुष कहा गया है । जो मनके निश्चय से किया गया है, उसका द्रव्य, ओ…
- Verses 6–10तब मेरी सृष्टि के लिए अवकाश कहाँ है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं। आप इस अनन्त स्वचित्ताकाश…
- Verse 11हे भास्कर, मैं शीघ्र अनेक प्राणियों के समूहों की रचना करता हूँ, इसलिए हे भगवन्, आप ही शी…
- Verses 12–15मेरे द्वारा प्रेरित होकर आप अपनी इच्छानुसार सृष्टि कीजिए । तदुपरान्त हे तपस्विश्रेष्ठ, मह…
- Verse 16हे मुने, यह सब मैंने आपसे महात्मा मनका स्वरूप कहा तथा मनकी सर्व कारिता और सामर्थ्य का वर्…
- Verse 17जो-जो वस्तु इस चित्त में स्फुरण को प्राप्त होती है, वह सब आविर्भाव को, स्थिरता को और सफलत…
- Verse 18साधारण ब्राह्मण होकर भी मनकी भावना के कारण ऐन्दव ब्राह्मण ब्रह्मता (ब्रह्मा के पद) को प्र…
- Verses 19–21जैसे एेन्दव जीव चिद्भाव से चित्तत्व को प्राप्त कर चित्तत्व से हिरण्यगर्भता को प्राप्त हुए…
- Verse 22इसलिए सब लोग मैं देवता हूँ, मैं मनुष्य हूँ इत्यादि देह के नाम से अपने को कहते हैं, एकरूप…
- Verse 23सूक्ष्म वासनावाला यह चित्त जीव कहलाता है ओर स्थूलताभ्रम से युक्त यह चित्त देह कहलाता है,…
- Verse 24हे वसिष्ठजी, इस प्रकार तन्तुओं से पट की तरह किसीकी भी देह चित्त से पृथक् नहीं हे । न मैं…
- Verses 25–26उनके द्वारा दूसरी सृष्टि की गई है, यह भी मेरे चित्त की ही कल्पना है, इसलिए वह सृष्टि भी म…
- Verse 27परमार्थरूपिणी शुद्ध चिति ही इस प्रकार भावना करने से जीव, तदनन्तर मन होकर व्यर्थ इस प्रकार…
- Verse 28चिद्- वपु चेतन परमात्मा ही एेन्दवों के संसार की नाई सर्वात्मरूप से प्रतीत होता है जैसे अ…
- Verse 29चूँकि सूक्ष्मतम वासनामय शब्दतन्मात्राओं के अध्यास से इस जगत् की उत्पत्ति हुई है, इसलिए य…
- Verse 30यदि उदासीन चित्त से ही इस सबकी उत्पत्ति है, तो देहादि मे अहन्ता के अभिमान से यह अनुदासीनर…
- Verse 31इस प्रकार जडाजड विरूद्धस्वभाव होने से भी मन मायिक ही है, ऐसा कहते हैं। संकल्परूपी विपुलाक…
- Verse 32वह कब दश्यरूप होता है और कब ब्रह्मरूप होता है ? यदि ऐसी किसीको शंका हो, तो इस पर कहते है।…
- Verse 33इस प्रकार जगत् भी जडाजडरूप विरूद्धस्वभाव होनेसे मायिक ही है, ऐसा कहते है । ब्रह्म सर्वमय…
- Verses 34–36यह जड है अथवा यह चेतन है यह व्यवस्था अनुपलब्धि के समय होती है या उपलब्धि के बाद ? पहले पक…
- Verse 37भाव यह है कि विषयावच्छिन्न चैतन्य और मनोवच्छिन्न चैतन्य के इन्द्रिय द्वारा अभिन्न यानी अप…
- Verse 38इसमें चिद्भाग ज्ञानांश है ओर चेत्यभाग जड़ दिखाई देता है । इस प्रकार जगद्भ्रान्तिको देखता…
- Verse 39चित्त मेँ स्थित चित्स्वभाव ही चित्त ओर जगत् इस भेद से दो प्रकार का किया गया हे । इसलिए ए…
- Verse 40निर्विभाग भी चेतन अन्यरूप दृश्यरूप से स्वगतभेदतुल्य अपने शरीर को देखकर भ्रमसे आर्त होकर भ…
- Verse 41वास्तव में यहाँ न भ्रान्तिहे, न भ्रान्तियुक्त पुरुष है, यह निश्चय है, किन्तु परिपूर्ण साग…
- Verses 42–45इस चिति का सर्वरूपः (जगद्रूप) जाड्य भी चिति ही है, क्योंकि उस जाड्य में तुमको चित््वका अन…
- Verse 46यदि को शंका करे कि अहन्ता में जडता कैसे है ? तो उसपर ब्रह्म से व्यावृत्त होने के कारण वह…
- Verse 47पदार्थ आदिरूप से सर्वरूप मन ही वृद्धि को प्राप्त होता है, नाना प्रकार का चित्रूपी यह आतिव…
- Verse 48इसका किस प्रकार ज्ञान हो सकता है ? इसका उपाय कहते है । स्थूल देह आदिरूप तीन देहो की प्रति…
- Verse 49विचाररूप शोधन करने पर चित्त क्या होता है ? यह कहते है । चित्तरूपी तबि का शोधन करनेपर जब व…
- Verse 50देह आदि असत् है, इसलिए भी वे शोधनयोग्य नहीं है, ऐसा कहते है। जो वस्तु वर्तमान रहती हे, उ…
- Verse 51अतएव आत्मा आदि शब्द देह में प्रयुक्त किये गये भी श्रुतिमें देहवाची नहीं देखे गये, क्योकि…
- Verse 52यदि कोई कहे अमूर्त चित्त मूर्त देहभाव को कैसे प्राप्त हुआ ? तो उसकी भावना से ही प्राप्त ह…
- Verses 53–54उक्त अर्थ का ही स्पष्टरूप से प्रतिपादन करते हुए उपसंहार करते हैं । प्रतिभासस्वरूप चित्त ज…