Guru's AddaGuru's Adda

Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 91

नब्बेवाँ सर्ग समाप्त इक्यानबेवाँ सर्ग भानु को मनु बनाकर ब्रह्मा की सृष्टि का और ऐन्दवों की सृष्टि के समान विश्व की मनोमात्रविलासता का निरूपण |

37 verse-groups

  1. Verse 1भानु ने कहा : हे भगवन्‌, चूँकि भरत का शाप मनोनिग्रह में समर्थ नहीं हुआ, इसलिए मैं यह कहता…
  2. Verse 2इसलिए एेन्दवों की सृष्टियों का विनाश आप नहीं कर सकते, चूँकि आप महात्मा हैं, इसलिए आपके लि…
  3. Verse 3हे नाथ, इस संसार में ओर विविध संसारो में वह कौनसी वस्तु है, जो कि महात्मा ओर सबके स्वामी…
  4. Verses 4–5मन जगतों का कर्ता है, मन पुरुष कहा गया है । जो मनके निश्चय से किया गया है, उसका द्रव्य, ओ…
  5. Verses 6–10तब मेरी सृष्टि के लिए अवकाश कहाँ है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं। आप इस अनन्त स्वचित्ताकाश…
  6. Verse 11हे भास्कर, मैं शीघ्र अनेक प्राणियों के समूहों की रचना करता हूँ, इसलिए हे भगवन्‌, आप ही शी…
  7. Verses 12–15मेरे द्वारा प्रेरित होकर आप अपनी इच्छानुसार सृष्टि कीजिए । तदुपरान्त हे तपस्विश्रेष्ठ, मह…
  8. Verse 16हे मुने, यह सब मैंने आपसे महात्मा मनका स्वरूप कहा तथा मनकी सर्व कारिता और सामर्थ्य का वर्…
  9. Verse 17जो-जो वस्तु इस चित्त में स्फुरण को प्राप्त होती है, वह सब आविर्भाव को, स्थिरता को और सफलत…
  10. Verse 18साधारण ब्राह्मण होकर भी मनकी भावना के कारण ऐन्दव ब्राह्मण ब्रह्मता (ब्रह्मा के पद) को प्र…
  11. Verses 19–21जैसे एेन्दव जीव चिद्भाव से चित्तत्व को प्राप्त कर चित्तत्व से हिरण्यगर्भता को प्राप्त हुए…
  12. Verse 22इसलिए सब लोग मैं देवता हूँ, मैं मनुष्य हूँ इत्यादि देह के नाम से अपने को कहते हैं, एकरूप…
  13. Verse 23सूक्ष्म वासनावाला यह चित्त जीव कहलाता है ओर स्थूलताभ्रम से युक्त यह चित्त देह कहलाता है,…
  14. Verse 24हे वसिष्ठजी, इस प्रकार तन्तुओं से पट की तरह किसीकी भी देह चित्त से पृथक्‌ नहीं हे । न मैं…
  15. Verses 25–26उनके द्वारा दूसरी सृष्टि की गई है, यह भी मेरे चित्त की ही कल्पना है, इसलिए वह सृष्टि भी म…
  16. Verse 27परमार्थरूपिणी शुद्ध चिति ही इस प्रकार भावना करने से जीव, तदनन्तर मन होकर व्यर्थ इस प्रकार…
  17. Verse 28चिद्‌- वपु चेतन परमात्मा ही एेन्दवों के संसार की नाई सर्वात्मरूप से प्रतीत होता है जैसे अ…
  18. Verse 29चूँकि सूक्ष्मतम वासनामय शब्दतन्मात्राओं के अध्यास से इस जगत्‌ की उत्पत्ति हुई है, इसलिए य…
  19. Verse 30यदि उदासीन चित्त से ही इस सबकी उत्पत्ति है, तो देहादि मे अहन्ता के अभिमान से यह अनुदासीनर…
  20. Verse 31इस प्रकार जडाजड विरूद्धस्वभाव होने से भी मन मायिक ही है, ऐसा कहते हैं। संकल्परूपी विपुलाक…
  21. Verse 32वह कब दश्यरूप होता है और कब ब्रह्मरूप होता है ? यदि ऐसी किसीको शंका हो, तो इस पर कहते है।…
  22. Verse 33इस प्रकार जगत्‌ भी जडाजडरूप विरूद्धस्वभाव होनेसे मायिक ही है, ऐसा कहते है । ब्रह्म सर्वमय…
  23. Verses 34–36यह जड है अथवा यह चेतन है यह व्यवस्था अनुपलब्धि के समय होती है या उपलब्धि के बाद ? पहले पक…
  24. Verse 37भाव यह है कि विषयावच्छिन्न चैतन्य और मनोवच्छिन्न चैतन्य के इन्द्रिय द्वारा अभिन्न यानी अप…
  25. Verse 38इसमें चिद्भाग ज्ञानांश है ओर चेत्यभाग जड़ दिखाई देता है । इस प्रकार जगद्भ्रान्तिको देखता…
  26. Verse 39चित्त मेँ स्थित चित्स्वभाव ही चित्त ओर जगत्‌ इस भेद से दो प्रकार का किया गया हे । इसलिए ए…
  27. Verse 40निर्विभाग भी चेतन अन्यरूप दृश्यरूप से स्वगतभेदतुल्य अपने शरीर को देखकर भ्रमसे आर्त होकर भ…
  28. Verse 41वास्तव में यहाँ न भ्रान्तिहे, न भ्रान्तियुक्त पुरुष है, यह निश्चय है, किन्तु परिपूर्ण साग…
  29. Verses 42–45इस चिति का सर्वरूपः (जगद्रूप) जाड्य भी चिति ही है, क्योंकि उस जाड्य में तुमको चित््वका अन…
  30. Verse 46यदि को शंका करे कि अहन्ता में जडता कैसे है ? तो उसपर ब्रह्म से व्यावृत्त होने के कारण वह…
  31. Verse 47पदार्थ आदिरूप से सर्वरूप मन ही वृद्धि को प्राप्त होता है, नाना प्रकार का चित्रूपी यह आतिव…
  32. Verse 48इसका किस प्रकार ज्ञान हो सकता है ? इसका उपाय कहते है । स्थूल देह आदिरूप तीन देहो की प्रति…
  33. Verse 49विचाररूप शोधन करने पर चित्त क्या होता है ? यह कहते है । चित्तरूपी तबि का शोधन करनेपर जब व…
  34. Verse 50देह आदि असत्‌ है, इसलिए भी वे शोधनयोग्य नहीं है, ऐसा कहते है। जो वस्तु वर्तमान रहती हे, उ…
  35. Verse 51अतएव आत्मा आदि शब्द देह में प्रयुक्त किये गये भी श्रुतिमें देहवाची नहीं देखे गये, क्योकि…
  36. Verse 52यदि कोई कहे अमूर्त चित्त मूर्त देहभाव को कैसे प्राप्त हुआ ? तो उसकी भावना से ही प्राप्त ह…
  37. Verses 53–54उक्त अर्थ का ही स्पष्टरूप से प्रतिपादन करते हुए उपसंहार करते हैं । प्रतिभासस्वरूप चित्त ज…