Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
चित्तस्य एव भावोऽसौ शुद्ध एव द्विधा कृतः ।
अतः सर्वं जगत्सैव द्वैतलब्धं च सैव तत् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त मेँ स्थित चित्स्वभाव ही चित्त ओर जगत् इस भेद से दो प्रकार का किया
गया हे । इसलिए एकमात्र चिद्बुद्धि से ज्ञात यह सम्पूर्ण जगत् चित् ही है और द्वैतबुद्धि से ज्ञात
भी यह जगत् चित् ही है