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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

दृश्यानुभवसत्यात्म न सद्भावे विलासि तत् । कटकत्वं यथा हेम्नि तथा ब्रह्मणि संस्थितम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

वह कब दश्यरूप होता है और कब ब्रह्मरूप होता है ? यदि ऐसी किसीको शंका हो, तो इस पर कहते है। मन दृश्य के अनुभव कालमें दुश्यकी तरह स्थित रहता हे । सत्य आत्मा के सद्भाव में ब्रह्म के अनुभव से अतिरिक्त उसका विलास नहीं रहता, अतः ब्रह्म ही है, जैसे सुवर्ण मेँ कटकत्व हाथ के अलंकरणरूप कार्य की दृष्टिसे सुवर्ण से पृथक्‌ होता हुआ भी सुवर्णदृष्टि से सुवर्ण ही रहता है, वैसे ही मन भी ब्रह्मरूप से स्थित रहता हे