Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verses 4–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
मनो हि जगतां कर्तृ मनो हि पुरुषः स्मृतः ।
यन्मनोनिश्चयकृतं तद्द्रव्यौषधिदण्डनैः ॥ ४ ॥
हन्तुं न शक्यते जन्तोः प्रतिबिम्बं मणेरिव ।
तस्मादेतेऽत्र तिष्ठन्तु भासुरैः सर्गसंभ्रमैः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
मन
जगतों का कर्ता है, मन पुरुष कहा गया है । जो मनके निश्चय से किया गया है, उसका द्रव्य,
ओषधि, दण्ड आदि से विनाश नहीं किया जा सकता | जैसे कि मणि के प्रतिबिम्ब का विनाश
नहीं किया जा सकता, इसलिए ये एेन्दव द्विज यहाँ पर देदीप्यमान अपनी सृष्टि भ्रान्तियों के
साथ स्थित रहें