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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

चित्तेव चेत्यते जाड्यं स्वप्ने स्वमरणोपमम् । सर्वात्मत्वात्सर्वशक्तीः कुर्वती नैति साम्यताम् ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि को शंका करे कि अहन्ता में जडता कैसे है ? तो उसपर ब्रह्म से व्यावृत्त होने के कारण वह जड़ है, ऐसा कहते है । पर तत्त्व मे अहन्ता आदि तनिक भी नहीं है, क्योकि वह चिदेकरस है, जैसे जलमें लहर आदि पृथक्‌ नहीं हैं, वैसे ही वह केवल संविदेकरस हे ॥४ ३॥ इसीलिए अहन्ताकी असत्ता भी है, ऐसा कहते हैँ । आविभवि को प्राप्त हुआ जो चैत्य है, उसे अहन्ता से दिखाई देनेवाला जानो, वह मृगतुष्णिका के जलके अनुरूप हे । वस्तुतः वह है ही नहीं । सम्पूर्णं द्वैत का बाध होने पर भी विनष्ट न होनेवाले आत्मतत्व को अहन्ता का अनाश्रय जानिये ओर उस निरामय ज्ञानरूप चित्स्वभाव को ही लोग वासना से घनीभूत अहन्तादिरूप से जानते हें, जेसे कि शीतलता को ही घनीभाव होने पर हिम रूप में देखते हैं ४४ ,५५॥ स्वप्न में अपने मरण के तुल्य चेतन ही जाड्य को प्राप्त करता हे । सबके आत्मस्वरूप होने के कारण सम्पूर्ण शक्तियों का आविष्कार करता हुआ चेतन ज्ञान की दृढता के बिना समता को प्राप्त नहीं होता