Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
किं तदस्ति जगत्यस्मिन्विविधेषु जगत्सु च ।
तवापि नाथ नाथस्य यद्दैन्याय महात्मनः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे नाथ, इस संसार में ओर विविध संसारो में
वह कौनसी वस्तु है, जो कि महात्मा ओर सबके स्वामी आपकी दीनता के लिए हो ? यानी मेरी
सृष्टि वृथा है, ऐसा समझकर आपको दीनता का अवलम्बन नहीं करना चाहिए