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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verses 25–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, verses 25–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 25,26

संस्कृत श्लोक

यथैन्दव मनो ब्रह्मा तथैवायमहं स्थितः । तत्कृतं चाहमेवेदं संकल्पात्मैव भासते ॥ २५ ॥ कश्चिच्चित्तविलासोऽयं ब्रह्माहमिह संस्थितः । स्वभाव एव देहादि विद्धि शून्यतरात्मखात् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

उनके द्वारा दूसरी सृष्टि की गई है, यह भी मेरे चित्त की ही कल्पना है, इसलिए वह सृष्टि भी मैं ही हूँ, ऐसा कहते हैं। जैसे ऐन्दवों का मन ब्रह्मा है, वैसे ही यह मैं भी मन की कल्पना से ब्रह्मा होकर स्थित हूँ, उनके द्वारा की गई संकल्पात्मक सृष्टि भी मैं ही हूँ। कोई चित्त का विलासरूप यह मैं ब्रह्मारूप से स्थित हूँ । परमात्मा ही सम्पूर्ण प्रपंचो से शून्य चिदाकाश से मानों पृथक्‌ होकर देहादिरूप से प्रतीत होता है, ऐसा जानो