Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verses 53–54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, verses 53–54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 53,54
संस्कृत श्लोक
यद्यद्यथा स्फुरति सुप्रतिभात्मचित्तं तत्तत्तथा भवति देहतयोदितात्म ।
देहोऽयमस्ति न न चाहमिति स्वरूपं विज्ञानमेकमवगम्य निरिच्छमास्स्व ॥ ५३ ॥
देहोऽयमेष च किलायमिति स्वभावाद्देहोऽयमेतदखिलं तत एति नाशम् ।
यक्षादिकल्पनवशाद्भयमेति बालो निर्यक्षदेहगत एव कयापि युक्त्या ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ का ही स्पष्टरूप से प्रतिपादन करते हुए उपसंहार करते हैं ।
प्रतिभासस्वरूप चित्त जब जब जिस रूप से स्फुरित होता है तब तब उस प्रकार के देह के
रूप से उदित होता है । यह देह नहीं है, ˆअहम्“ रूप से प्रसिद्ध अहंकार भी नहीं है, इसलिए
तुम एकरस स्वस्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर इच्छाशून्य होकर स्थित होओ | जैसे बालक किसी
युक्ति से यक्षरहित देह में प्राप्त होकर भी यक्ष, उसकी भीषणता आदि कल्पना से भयको
प्राप्त होता है वैसे ही यह मनुष्य आदिका शरीर है, यह प्रत्यक्ष देहभोग्य प्रपंच है यों अपनी
कल्पना से यह आत्मा ही देह होता है और यही सम्पूर्ण भोग्य होता है। उन उन भावों को प्राप्त
होने से देह आदिके नाश के पश्चात् नाश को प्राप्त होता हे