Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verses 42–45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, verses 42–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
सर्वं स्याज्जाड्यमप्यस्याश्चितिश्चित्त्वं च वेत्सि तत् ।
चिद्भागोंशोऽवबोधस्य त्वहंताजडतोदयः ॥ ४२ ॥
अहंतादिपरे तत्त्वे मनागपि न विद्यते ।
ऊर्म्यादीव पृथक्तोये संवित्सारं हि तद्यतः ॥ ४३ ॥
अहंप्रत्ययसंदृश्यं चेत्यं विद्धि समुत्थितम् ।
मृगतृष्णाम्ब्विवान्तस्थं नूनं विद्यत एव नो ॥ ४४ ॥
अहंतापदमन्तात्मपदं विद्धि निरामयम् ।
विदं विदुरहंतादि शैत्यमेव यथा हिमम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस चिति का सर्वरूपः
(जगद्रूप) जाड्य भी चिति ही है, क्योंकि उस जाड्य में तुमको चित््वका अनुभव होता हे, यदि
उसे अचिदेकस्वभाव ही माना जाय, तो उसका स्फुरण नहीं होगा ओर स्फुरण न होनेसे
जाड्य की भी सिद्धि नहीं होगी, जैसे जडमें अवबोध है, वैसे ही चेतनमें जडभाग भी हे,
ज्ञानका अंश चिद्भाव है और जडता का उदय अहन्ता है