Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verses 12–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, verses 12–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 12-15
संस्कृत श्लोक
कुरु सर्गं यथाकामं मया समभिचोदितः ।
अथैतत्स महातेजा मम वाक्यं प्रभाकरः ॥ १२ ॥
अङ्गीकृत्य द्विधात्मानं चकार तपतांवर ।
एकेन प्राक्तनेनास्मिन्वपुषा सूर्यतां गतः ॥ १३ ॥
व्योमाध्वगतया सर्गे ततान दिवसावलिम् ।
मन्मनुत्वं द्वितीयेन कृत्वा स्ववपुषा क्षणात् ॥ १४ ॥
ससर्ज सकलां सृष्टिं तां तामभिमतां मम ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरे द्वारा प्रेरित होकर आप
अपनी इच्छानुसार सृष्टि कीजिए । तदुपरान्त हे तपस्विश्रेष्ठ, महा तेजस्वी सूर्य ने मेरे इस
वाक्य को स्वीकार कर अपने दो स्वरूप बना डाले | पहले के एक स्वरूप से वह ऐन्दवसृष्टि में
सूर्यता को प्राप्त हुए व्योममार्गगामी होकर उन्होंने उस स्वरूप से दिनपरम्परा का निर्माण
किया और दूसरे स्वरूप से शीघ्र मेरे लोकका मनुत्व स्वीकार कर मेरी अभीष्ट तत्-तत् सब
सृष्टियों की रचना की