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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

न सन्नासदहंरूपं सत्तासत्ते तदेव च । उपलम्भेन सद्रूपमसत्यं तद्विरोधतः ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

यदि उदासीन चित्त से ही इस सबकी उत्पत्ति है, तो देहादि मे अहन्ता के अभिमान से यह अनुदासीनरूप कैसे प्रतीत होता है ? इस पर कहते हैँ । जो अह॑रूप उदासीन-स्वभाव अनुभूत होता है, वह सत्‌ नहीं है, क्योकि सर्वत्र चित्त के कार्यो में उसका दर्शन नहीं होता ओर वह असद्‌ भी नहीं हे, क्योकि असद्‌ की उपलब्धि नहीं होती, इसलिए वह सत्ता-असत्तारूप है यानी सत्रूप होने से वह सत्‌ ही है, असत्स्वरूप होने से वह असत्‌ ही है, कहीं पर उसकी प्रतीति होती है, अतएव वह सत्‌-सा प्रतीत होता है, कहींपर उसकी उपलब्धि नहीं होती, अतः असत्स्वरूप है यों विरूद्धस्वभाववाला प्रतीत होता है, इसलिए वह मायिक ही है, यह अर्थ है