Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 85
चौरासीवाँ सर्ग समाप्त प्रचासीवों सर्ग सृष्टि करने की इच्छा कर रहे ब्रह्मा का दस ब्रह्माण्डों को देखना, वहाँ के एक सूर्य द्वारा उनके यथार्थ तत्त्वका वर्णन ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, मुझसे जो यह पहले ब्रह्माने कहा था, उस सबको मैं ब्रह्म…
- Verses 2–3पहले मैंने भगवान् ब्रह्मा से पूछा था, हे ब्रह्मन्, ये सब ब्रह्माण्ड कैसे उत्पन्न होते ह…
- Verse 4ब्रह्माजी ने कहा : वत्स श्रीवसिष्ठ, जगद्भाव को धारण करनेकी शक्तिवाला यह मन ही इस प्रकार…
- Verse 5पहले किसी कल्प में कल्प के आरम्भ में जागे हुए ओर संसार की सृष्टि करनेवाले मेरा जो कुछ वृत…
- Verses 6–7किसी समय कल्प के अन्त में सम्पूर्णं जगत् का संहार करके अकेले मैंने ही एकाग्र ओर स्वस्थ ह…
- Verses 8–9दृष्टि लगाते ही अत्यन्त विस्तृत अन्तरहित असीम शून्य आकाशको मैने देखा । वह न तो अन्धकार से…
- Verse 10इसके बाद मैने विस्तृत आकाश मेँ अलग-अलग स्थित, विविध व्यापारो से युक्त एवं वहाँ के विष्णु…
- Verse 11उन ब्रह्माण्डं में मेरे प्रतिबिम्ब के तुल्य पद्मकोश में रहनेवाले ओर राजहंसो पर बैठे हुए द…
- Verses 12–14उन पृथक् पृथक् स्थित सर्गो में, जिनमें चतुर्विध प्राणिवर्ग उत्पन्न हो रहा है, जलो को जा…
- Verses 15–17कालचक्र में गुँथी हुई शीत, ग्रीष्म, वर्षा आदि स्वभाववाली सब ऋतुएँ अपने अपने अवसर पर फलों…
- Verses 18–19सात लोक, सात द्वीप, समुद्र, पर्वत, जिन्हें काल विनाश की ओर ले जानेवाला है यानी विनाशी है,…
- Verse 20जिसमें आकाशरूपी नीलोत्पल के मध्यमें मेघरूपी भ्रमर घूम रहे हैं तथा चमकते हुए तारासमूहरूपी…
- Verse 21कल्पान्त की तरह निबिड कुहरा मेरु की झाड़ियों में ऐसे स्थित है, जैसे कि सेमल की निर्मल रूई…
- Verses 22–23लोकालोक पर्वत ही जिसकी श्रृंखला है, शब्द करते हुए अर्णव ही जिसके भूषण के शब्द हैं, अन्धका…
- Verse 24संवत्सरलक्ष्मी के कण्ठ में धारण की गई अन्धकार ओर प्रकाशरूपी श्वेतकमल ओर नीलकमलों से बनी ह…
- Verse 25भुवनरूपी गर्तो में स्थित बहुत से प्राणी जिनमें बीजके (दाडिमदबीजके) तुल्य हैं, ऐसे लोक (ब्…
- Verse 26तीन प्रवाहोवाली ऊर्ध्वं लोक में और अधोलोक में गमन ओर आगमन करनेवाली गंगा नदी, जो कि चन्द्र…
- Verse 27दिशारूपी लताओं में तडद्रूपी फूलों से युक्त मेघरूपी पल्लव वायु से टकरा कर इधर-उधर घूमते है…
- Verse 28समुद्र, भूमि ओर आकाशका आश्रयभूत जगत् वितानो से (विस्तारो से) शोभित होनेवाली गन्धर्वनगर क…
- Verse 29उन भुवनो के मध्य में गूलर के फल के मध्यमें स्थित छोटे छोटे मशकों के समान देवता, असुर, नर,…
- Verse 30उन लोकों के मध्य में युग, कल्प, क्षण, लव, कला, काष्ठा आदि से युक्त अतर्कित सबके विनाश की…
- Verse 31इस सबका अपने परम शुद्ध चित्त से विचार कर मैं अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हुआ कि यह क्या हे…
- Verse 32जिस मायाजाल को चर्मचक्ुसे मैंने कुछ भी नहीं देखा, उस अतुल मायाजाल को मेँ मन से आकाश में द…
- Verse 33इसके वाद चिरकाल तक उस अतुल मायाजाल को देखकर मैने मन से ही उस भुवन के आकाश से एक सूर्य को…
- Verse 34स्वागत हो, ऐसा मैंने पहले उससे कहा फिर यह निम्ननिर्दिष्ट प्रश्न पूछा
- Verse 35तुम कौन हो, यह तुम्हारा जगत् कैसे उत्पन्न हुआ एवं इससे अतिरिक्त ओर जो नौ जगत् हैं, वे क…
- Verses 36–37ऐसा मेरे पूछने पर ओर मुझे देखकर ये इस लोकके ब्रह्मा हैं, यो उन्होंने मुझे पहचान लिया । तद…
- Verse 38हे सर्वव्यापिन्, यदि मेरे वाक्य-सन्दर्भ को सुनने में आपको कौतुक हो, तो आपके द्वारा जिसका…
- Verse 39हे महात्मन्, आप सर्वशक्तिमान् होने के कारण व्यवहार में ईश्वर रूप से व्यवहृत होते हैं और…