Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verses 36–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 36,37
संस्कृत श्लोक
इत्युक्तो मां समालोक्य संपरिज्ञातवानथ ।
नमस्कृत्वाभ्युवाचेदमनिन्द्यपदया गिरा ॥ ३६ ॥
श्रीभानुरुवाच ।
अस्य दृश्यप्रपञ्चस्य नित्यं कारणतामसि ।
गतः कस्मान्न जानीषे किं मामीश्वर पृच्छसि ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसा मेरे
पूछने पर ओर मुझे देखकर ये इस लोकके ब्रह्मा हैं, यो उन्होंने मुझे पहचान लिया ।
तदनन्तर मुझे नमस्कार करके अनिन्दनीय पदों से युक्त वाणी से सूर्य ने मुझसे कहा : हे
भगवन्, आप इस दृश्य प्रपंच के नित्य कारणता को प्राप्त हैं, क्या आप इसके वृत्तान्त को
नहीं जानते, जो कि मुझसे पूछते हैं