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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verses 8–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 8,9

संस्कृत श्लोक

यावत्पश्यामि गगनं न तमोभिर्न तेजसा । व्याप्तमत्यन्तविततं शून्यमन्तविवर्जितम् ॥ ८ ॥ सर्गं संकल्पयामीति मतिं निश्चित्य तन्मया । समवेक्षितुमारब्धं शुद्धं सूक्ष्मेण चेतसा ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

दृष्टि लगाते ही अत्यन्त विस्तृत अन्तरहित असीम शून्य आकाशको मैने देखा । वह न तो अन्धकार से व्याप्त था और न तेज से | मैं सृष्टि की कल्पना करूँ, ऐसा निश्चय करके मैंने सूक्ष्म चित्त से उस द्रष्टव्य वस्तु का शुद्धतापूर्वक निरीक्षण करना आरम्भ किया