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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

कदाचिदखिलं सर्गं संहृत्य दिवसक्षये । एक एवाहमेकाग्रः स्वस्थस्तामनयं निशाम् ॥ ६ ॥ निशान्ते संप्रबुद्धात्मा संध्यां कृत्वा यथाविधि । प्रजाः स्रष्टुं दृशौ स्फारे व्योम्नि योजितवानहम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

किसी समय कल्प के अन्त में सम्पूर्णं जगत्‌ का संहार करके अकेले मैंने ही एकाग्र ओर स्वस्थ होकर कल्पान्तरूपी रात्रि को बिताया । प्रातःकाल यानी कल्प के आरम्भमें जाग कर यथाविधि सन्ध्योपासन आदि करके सृष्टि करने के लिए आकाश में मैंने अपनी विशाल दृष्टि लगाई