Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

लोकालोकाद्रिरसनारणदर्णवघुंघुमा । तमःखण्डेन्द्रनीलाभा निजरत्नविराजिता ॥ २२ ॥ धानाधरसुधा भूतरवकाकलिघुंघुमा । संस्थिता भुवनाभोगे स्वान्तःपुर इवाङ्गना ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

लोकालोक पर्वत ही जिसकी श्रृंखला है, शब्द करते हुए अर्णव ही जिसके भूषण के शब्द हैं, अन्धकार के टुकड़े ही जिसमें इन्द्रनील मणिकी प्रभाएँ हैं, अपने भीतर स्थित रत्नों से जो विराजित हे, धान आदि के बीज ही प्राणियों द्वारा आस्वादित होने के कारण जिसकी अधर-सुधा हैं ओर प्राणियों के शब्द ही जिसके मधुर अस्फुट वाग्विलास हैं, इस प्रकार की पृथ्वी अपने अन्तःपुरमें नायिका के समान भुवनाभोग में स्थित हे