Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
सदसदिति कलाभिराततं यत् सदसदबोधविमोहदायिनीभिः ।
अविरतरचनाभिरीश्वरात्मन् प्रविलसतीह मनो महन्महात्मन् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महात्मन्, आप सर्वशक्तिमान् होने
के कारण व्यवहार में ईश्वर रूप से व्यवहृत होते हैं और परमार्थदुष्टि से तो आप महात्मा
हैं, यह सत् है या असत् है, यों तत्वतः बोध न होनेके कारण विमोहित करनेवाली और
निरन्त जगत् की रचना करनेवाली तथा कभी सत् कभी असत् कहीं पर सत् कहीं पर असत्
यों देश और काल से परिच्छिन्न जगत् की सत्ता दशनि मेँ कुशल कलाओं से जो चारों ओर
से व्याप्त है वह मन ही तत्-तत् रूप में स्फुरित हो रहा है, यह आप जानिये