Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अथाहं दृष्टवांस्तत्र मनसा विततेऽम्बरे ।
पृथक्स्थितान्महारम्भान्सर्गान्स्थितिनिरर्गलान् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
इसके बाद मैने विस्तृत आकाश मेँ अलग-अलग
स्थित, विविध व्यापारो से युक्त एवं वहाँ के विष्णु आदि के द्वारा की गई पालन आदि की
व्यवस्था से निष्कण्टक ब्रह्माण्डं को देखा