Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
गौराङ्गपङक्तिर्मध्यस्था रजनीराजिरञ्जिता ।
पद्मोत्पलस्रज इव लक्ष्यते वत्सरश्रियः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
संवत्सरलक्ष्मी
के कण्ठ में धारण की गई अन्धकार ओर प्रकाशरूपी श्वेतकमल ओर नीलकमलों से बनी
हुई माला के अन्दर प्रविष्ट अतएव उसके पराग के तुल्य बिजली, नक्षत्र आदि से व्याप्त
होने के कारण हल्दी के लेप के तुल्य रात्रिसमूहरूप अंगराग रंजित खूब गौर कण्ठ, वक्षःस्थल,
उदर, त्रिवली, नाभि आदि अंगों की पंक्ति की तरह द्युलोक दिखाई देता हे