Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
सप्तलोकास्तथा द्वीपाः समुद्रा गिरयस्तथा ।
अप्येष्यमाणाः कल्पान्तं स्फुरन्त्युरुतरारवम् ॥ १८ ॥
क्वचिद्भासित्वमायातं क्वचित्स्थिरतरं स्थितम् ।
स्थितं सर्वत्र कुञ्जेषु तमस्तेजोलवादृतम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
सात लोक, सात द्वीप,
समुद्र, पर्वत, जिन्हें काल विनाश की ओर ले जानेवाला है यानी विनाशी है, बड़े कोलाहल
से युक्त होकर स्फुरित होते हैँ । तम कहीं पर अनावृत्तदेश में हासता को प्राप्त होता है,
कहीं पर पर्वतगुहा आदि में अत्यन्त स्थिररूप से स्थित है और कहीं पर सब झाड़ियों में
तेजके कणों से मिश्रित होकर स्थित है