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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verses 12–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verses 12–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 12-14

संस्कृत श्लोक

पृथक्स्थितेषु सर्गेषु तेषूद्यद्भूतपङ्क्तिषु । जलजालेषु शुद्धेषु जगत्सु जलदायिषु ॥ १२ ॥ प्रवहन्ति महानद्यः प्रध्वनन्ति यथाब्धयः । प्रतपन्त्युष्णरुचयः प्रस्फुरन्त्यम्बरेऽनिलाः ॥ १३ ॥ दिवि क्रीडन्ति विबुधा भुवि क्रीडन्ति मानवाः । दानवा भोगिनश्चैव पातालेषु च संस्थिताः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

उन पृथक्‌ पृथक्‌ स्थित सर्गो में, जिनमें चतुर्विध प्राणिवर्ग उत्पन्न हो रहा है, जलो को जाल के समान बाँधनेवाले अवग्रह आदि से रहित जल देनेवाले मेघो में ओर जगतो में महानदियाँ बहती हैं, सागर गरजते हैं, सूर्य तपते हैं, वायु आकाश में इधर-उधर परिभ्रमण करते हैं, स्वर्गमें देवता विविध क्रीड़ाएँ करते हैं, पृथ्वीमें मनुष्य क्रिडाएँ करते हैं, दानव और नाग पातालों में स्थित है