Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मोवाच ।
सर्वं हि मन एवेदमित्थं स्फुरति भूतिमत् ।
जलं जलाशयस्फारैर्विचित्रैश्चक्रकैरिव ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माजी ने कहा : वत्स श्रीवसिष्ठ, जगद्भाव को धारण करनेकी शक्तिवाला यह मन ही
इस प्रकार सब पदार्थो के रूप में स्फुरित होता हे, जैसे कि जलाशयमें विशालता को प्राप्त
विचि बड़े-बड़े आवर्तो के रूप से जल ही स्फुरित होता है