Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
दिनादौ संप्रबुद्धस्य संसारं सृष्टुमिच्छतः ।
पुराकल्पे हि कस्मिश्चिच्छृणु किं वृत्तमङ्ग मे ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले किसी कल्प में कल्प
के आरम्भ में जागे हुए ओर संसार की सृष्टि करनेवाले मेरा जो कुछ वृत्तान्त हुआ, उसे
आप सुनिये