Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 73
37 verse-groups
- Verse 1बहत्तरवाँ सर्गे समाप्त तिहत्तरवाँ सर्ग जीवयुक्त सूची के भोगविस्तार का पुनःवर्णन, तदनन्तर…
- Verse 2कर के हिमालय की बन्दरी-सी उस कर्कटी ने किन-किन भोगों का भोग किया ?
- Verses 3–5नारदजी ने कहा : हे देवराज, अत्यन्त क्षुद्र पिशाचता को प्राप्त हुई उस जीवयुक्त सूची का लोह…
- Verse 6जिस नाड़ी में रोगों का आश्रयभूत बाह्यवायु भरा रहता है, उस नाडी को प्राप्त होकर उसने उस ना…
- Verse 7उसने उन प्राणियों के शरीर ओर इन्द्रियो से उन्हीं प्राणियों के भोजनयोग्य बहुत भोजन तथा अन्…
- Verses 8–11पति के वक्षःस्थल में जिन्होंने मछली आदिके आकार के पत्रों को संक्रामित किया है, ऐसे कपोलों…
- Verses 12–13जैसे वायु-लेखा दिशाओं में नीचे ओर ऊपर उडती है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरो की नाड…
- Verse 14यदि कोड शंका करे कि प्रत्येक देहरूपी धर में उसने कैसे विहार किया 2 तो उस पर कहते हैं । सम…
- Verses 15–16जैसे जल में द्रवशक्ति विहार करती है, वैसे ही उसने रुधिर में विहार किया, जैसे समुद्र में आ…
- Verses 17–18वायुरूप हुई उसने वृक्ष, लता, ओषधि आदि के रस (निर्यास) आदि का उपभोग किया ओर हिंसा से इकडे…
- Verses 19–20मारूतरूपी तेज घोड़ेवाली, वायुरूप से बह रही, दिशाओं में व्याप्त उस लोहमयी सूचीने अदृश्य हो…
- Verses 21–23अदृश्य, शरीररहित तथा समष्टि और व्यष्टि के मन और पवनरूप देहवाली आकाशरूपी उस सूचीने जो न कि…
- Verse 24मेदा और मांस को निगलने में असमर्थ हुई वह अपने हृदय में इस प्रकार रोई, जैसे कि धनाढ्य वृद्…
- Verse 25जैसे नर्तकी रंग-स्थल में अपने शरीर में पहने हुए कंकण, बाजुबन्द आदि को नचाती है, वैसे ही उ…
- Verse 26बाहर उनचास वायुओं के स्तरों में और भीतर प्राणवायुओं मेँ एकता को प्राप्त हुई अतएव वायु की…
- Verses 27–28मन्त्र, ओषधि, तपस्या, दान, देवपूजा आदि से आहत हुई वह पर्वतनदी की ऊँची तरंगों के समान बाहर…
- Verses 29–32अपनी अपनी वासना के अनुसार सभी अपने पद की इच्छा करते हैं । राक्षसी ने सूचीको ही अपना पद बन…
- Verses 33–35इसके बाद अपने प्राक्तन तृप्त शरीर के स्मरण से उदरपूर्ति से प्राप्त होनेवाले सुखको चाहनेवा…
- Verse 36अपने भीतर प्रविष्ट रोगसूचिता से अधिष्ठित तथा सूची से प्रेरित किया गया उक्त गीध अपने में प…
- Verse 37जैसे वायु से प्रेरित मेघ पर्वत को प्राप्त होता है, वैसे ही अपने भीतर प्रविष्ट हुई सूची द्…
- Verses 38–39जैसे योगी अपनी बुद्धिवृत्ति को सम्पूर्णं संकल्पो से रहित परम पद में स्थापित करता हे, वैसे…
- Verse 40वह एक ही पैर के प्रान्त से स्थित लोहसूची पर्वत के शिखरपर गध द्वारा प्रतिष्ठापित देवप्रतिम…
- Verse 41गीध-द्वारा स्थापित की गई और खडी हुई स्नेहमयी सूचीको देखकर जीवयुक्त सूचिका गीध के शरीर से…
- Verses 42–43बाहर निकलने के लिए जिसकी बुद्धि अत्यन्त उत्सुक थी ऐसी जीवसूची वायु से नासिका से प्राणवायु…
- Verse 44जैसे भारवाही पुरूष भार को छोड़ करके सुखी होकर अपने स्थान को जाता है, वैसे ही गीध भी विसूच…
- Verse 45अमूर्त पदार्थ की किसी आधार के बिना तपस्या आदि क्रियाएँ सिद्ध नहीं हो सकती, यह विचार कर वह…
- Verse 46जैसे पिशाची सेमर के वृक्ष को चारों ओर से व्याप्त कर लेती हे ओर जैसे आँधी सुगन्धि के लेश क…
- Verse 47हे इन्द्र, तदनन्तर तभी से लेकर यह दीर्घ तपस्या करनेवाली सूची बहुत वर्षो से उक्त जंगल में…
- Verse 48हे कर्तव्यार्थ का निर्णय करने मेँ परम कुशल देवराज, उसको वरदान द्वारा ठगने के लिए आप प्रयत…
- Verse 49श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामजी, इस प्रकार उक्त सूचीका वृत्तान्त नारदजी से सुनकर इन्द्र ने…
- Verse 50तदनन्तर वायु का दिव्यदुष्टिरूप ज्ञान उसको देखने के लिए गया यानी वायुने दिव्यदृष्टि से गन्…
- Verse 51शीघ्रता से युक्त वायु की संविद् ने (देवताने) एक अंश से ही सम्पूर्ण दिशाओं का पर्यालोचन क…
- Verses 52–59सब कुछ देख लिया, यह जो कहा उसका विस्तार करते हैं। सात समुद्रो के ओर भूमिके अन्त मेँ लोकाल…
- Verse 60पहले वायुसंविद् (वायुदेवता) वातस्कन्धो से (उनचास वायुओं के स्तरों से) अवतीर्णं हुई । जहा…
- Verse 61सूचिका का अन्वेषण करता हुआ वह वायु जम्बूद्वीप को देखकर हिमालय के उस शिखर में पहुँचा जहाँ…
- Verses 62–66अत्यन्त ऊँची शिखर की चोटी में, जहाँ वह सूची तप कर रही थी, उस महावन में वह गया, वह महावन द…
- Verse 67करके दीर्घमार्ग मेँ चलने के कारण थका था, अतः उसने भवर के समान शरीरवाले आकाश में लटकी हुई-…