Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verses 3–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, verses 3–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 3-5
संस्कृत श्लोक
श्रीनारद उवाच ।
जीवसूच्याः पिशाचत्वं गतायाः शक्र पेलवम् ।
आसीत्कार्ष्णायसी सूची तस्याः समवलम्बनम् ॥ ३ ॥
तत्समालम्बनं त्यक्त्वा व्योमवातरथस्थया ।
प्राणमारुतमार्गेण तया देहप्रविष्टया ॥ ४ ॥
सर्वेषामान्त्रतन्त्रीणां स्नायुमेदोवसासृजाम् ।
रन्ध्रेण पक्षिणेवान्तर्निलीनं मलिनात्मनाम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
नारदजी ने कहा : हे देवराज, अत्यन्त क्षुद्र पिशाचता को प्राप्त हुई उस जीवयुक्त सूची का
लोहे की सूची आश्रय थी, लोहसूचीरूपी आश्रय का त्याग करके आकाश में चलनेवाले वायुरूपी
रथ में बैठी हुई और प्राण-वायुके मार्ग से प्राणियों की देहमें प्रविष्ट हुई वह सब पापियों के
मांस, मेदा, वसा ओर रक्त की आँतों के सूराख से भीतर चिरकालतक लीन होकर ऐसे स्थित
रही, जैसे कि छिद्र से भीतर प्रवेशकर पक्षी स्थित रहता है