Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verses 27–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, verses 27–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 27,28
संस्कृत श्लोक
मन्त्रौषधितपोदानदेवपूजादिभिर्हता ।
बहिर्गिरिनदीतुङ्गतरङ्गवदुपद्रुता ॥ २७ ॥
दीपप्रभेवाविज्ञातगतिर्गत्याशु लीयते ।
अयःसूच्यां मातरीव तत्र निर्वृतिमेति सा ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
मन्त्र, ओषधि, तपस्या, दान, देवपूजा आदि से आहत हुई वह पर्वतनदी की
ऊँची तरंगों के समान बाहर भाग जाती थी । बुझी हुई दीपक की ज्योति के समान
अन्तर्धनि-गति से जिसकी गति जानी नहीं जा सकती ऐसी वह शीघ्र लोहसूची में छिप
जाती है ओर वहाँ पर जैसे बच्चा माता की गोद में विश्रान्ति को प्राप्त होता है, वैसे ही
विश्रान्ति-सुख को प्राप्त होती हे