Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verses 15–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 15,16
संस्कृत श्लोक
विहृतं रुधिरेष्वन्तर्द्रवशक्त्येव वारिषु ।
अब्धिष्वावर्तवृत्त्येव जठरेषु विवल्गितम् ॥ १५ ॥
सुप्तं मेदःसु शुभ्रेषु शेषाङ्गेष्विव शौरिणा ।
स्वादितश्चाङ्गगन्धोऽन्तः पीतशक्त्यामृतं यथा ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल में द्रवशक्ति विहार करती है, वैसे
ही उसने रुधिर में विहार किया, जैसे समुद्र में आवर्तशक्ति विहार करती है, वैसे ही उसने
प्राणियों के पेट में विहार किया । जैसे विष्णु भगवान् सफेद शेषनाग पर सोते हैं, वैसे ही
वह सफेद मेदा मेँ चिरकाल तक सोई रही । जैसे पाचनशक्ति अमृतका आस्वादन लेती है,
वैसे ही वायुरूप हुई उसने अंग के गन्ध का आस्वादन लिया