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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verses 29–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, verses 29–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 29-32

संस्कृत श्लोक

स्ववासनानुसारेण सर्व आस्पदमीहते । सूचित्वमेव राक्षस्या सूचीत्वेनास्पदीकृतम् ॥ २९ ॥ सर्वा विहृत्यापि दिशः स्वमेवास्पदमापदि । जीवसूची लोहसूचीमिवायाति जडो जनः ॥ ३० ॥ एवं प्रयतमाना सा विहरन्ती दिशो दश । मानसीं तृप्तिमायाता न शारीरीं कदाचन ॥ ३१ ॥ सति धर्मिणि धर्मा हि संभवन्तीह नासति । शरीरं विद्यते यस्य तस्य तत्किल तृप्यति ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

अपनी अपनी वासना के अनुसार सभी अपने पद की इच्छा करते हैं । राक्षसी ने सूचीको ही अपना पद बनाया, क्योकि उसका सूची के समान तीक्ष्ण स्वभाव था । जीवसूची सम्पूर्ण दिशाओं में विहार करके भी आपत्ति मेँ अपने ही पदभूत लोह-सूची को प्राप्त होती है, जैसे कि जड पुरूष आपत्ति में अपने ही स्थान को प्राप्त होता है । इस प्रकार प्रयत्न करती हुई, दसों दिशाओं में घूमती हुई उस जीवसूची को मानसिक तृप्ति तो यथाकथंचित्‌ प्राप्त हुई, किन्तु शारीरिक तृप्ति उसे कभी प्राप्त नहीं हुई । धर्मी के रहते धर्म रह सकते हैं, धर्मी के अभाव में धर्म कैसे रह सकते हैं जिसका शरीर रहता है, उसीका शरीर तृप्त होता है