Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 64
तिरसठवाँ सर्ग समाप्त चौसठवाँ सर्ग भोग्य की विचित्र शक्तियों के आविभाव का निरूपण तथा भोक्ता की जीवत्वप्राप्ति के क्रम का वर्णन ।
24 verse-groups
- Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जो यह घट-घटव्यापी स्वयंप्रकाश, कारणों का भी क…
- Verse 3अखण्ड अद्वितीय स्वप्रकाश ब्रह्म मे सखण्ड सद्वितीय जीवसत्ता कैसे उत्पन्न हो सकती हैं, इस प…
- Verse 4सत्यस्वरूप अविद्यासम्बन्धशून्य ब्रह्म में परमार्थद्वष्टि से जीवसत्ता का सम्भव नहीं है, कि…
- Verse 5उनमें से पहले को दशति है। उसका जो सम, परिपूर्ण, शुद्ध, चिह्नरहित सत्स्वरूप है, जिसका कि ज…
- Verse 6उसीका मोक्ष होने तक, उद्भव बीज की सत्ता होने से, उदित हुआ-सा उपाधिस्वभाव से जो चलनशक्त्या…
- Verse 7उसीमे सब नाम और रूपों का व्याकरण होता है, ऐसा कहते है । परम आदर्शङूप चिदाकाश में अनुभवरूप…
- Verses 8–9जगत् की विचित्रता की कल्पना के अनुरूप क्रियाशक्तिप्रधान प्राण बनना ही चित् का जीवभाव है…
- Verse 10जीवात्मा का जीवत्व जबतक मोक्ष नहीं होता, तबतक स्वाभाविक है, ऐसा कहते है । जैसे वायु का चल…
- Verses 11–12चिद्घन जो आत्मतत्त्व है, उसका स्वयं अपने स्वरूप के अपरिज्ञान के कारण जो अल्पज्ञान-सा (ज्ञ…
- Verse 13जैसे दर्शक पुरुष द्वारा अपने नेत्रो के गोचर न होनेवाले आकाशभाग में दौड़ाया गया नेत्र जहाँ…
- Verse 14जैसे आकाश अपनी निबिड़ता से (घनतासे) नीलिमा को प्राप्त होता है, वैसे ही अपने पूर्व संकल्प…
- Verse 15वायु के स्पन्द के समान स्फुरित हुआ अहंभाव आत्मा का दैशिक ओर कालिक परिच्छेद करता है, तथा स…
- Verses 16–18पूर्वोक्ति चित्त आदि भेद अहंभावाध्यासमूलक है, ऐसा कहते है । वही अहंकार संकल्पोन्मुख होकर…
- Verse 19जैसे बीज अपने स्पन्दन से धीरे- धीरे अंकुरित होता है, वैसे ही अपने स्पन्दन से धीरे-धीरे पं…
- Verse 20पूर्वकल्प में विराट में आत्मोपासना करने से संस्कृत हुए जीव को स्थूलसमण्टिरूप हिरण्यगर्भता…
- Verse 21कोई (जो उपासक नहीं है) ओर पुण्यात्मा ही, इस प्रकार दिव्य देह आदि की भावना से झटपट देव आदि…
- Verses 22–23कोई पापी पुरुष अपने संकल्प से स्वयं वृक्ष आदि स्थावर योनिको प्राप्त होता है, कोई पशु-पक्ष…
- Verse 24बरह्मा की सत्यसंकल्पता में पूर्व कल्प के सत्यसंकल्प ब्रह्मा ही मैं हूँ यह उपासना हेतु है,…
- Verse 25पहले चिदात्मा नामरूपात्मक दो धर्मवाले जगत्की प्रख्याति में कारण होता है, चलन (क्रिया), व…
- Verse 26जैसे जल से फेन (गाज) निकलता हे, वैसे ही चिदात्मा से स्वभावतः चित्त (जीव) आविर्भूत होता है…
- Verse 27लोक में देखा जाता है कि जो कोई कर्म करता है, वह पहले संकल्प करता है, तदुपरान्त व्यापार से…
- Verse 28पीछे होनेवाले कर्म पहले जीव में बीज में अंकुर के तुल्य वासना रूप से स्थित का ही आविष्कार…
- Verse 29जो अन्य व्यष्टि-जीव हैं, वे भी इसी प्रकार अपने में वासनारूप से स्थित ही आकृति को (देह आदि…
- Verses 30–31ऊपर (ऊँच योनियों में) या नीचे (नीच योनियो में) प्राप्त होते हैं चित् का जो स्पन्दन है, व…