Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
चित्स्वभावात्समायातं ब्रह्मत्वं सर्वकारणम् ।
संसृतौ कारणं पश्चात्कर्म निर्माय संस्थितम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले चिदात्मा नामरूपात्मक दो धर्मवाले जगत्की प्रख्याति में कारण होता है, चलन
(क्रिया), विकार आदि मे पश्चात्- भावी कर्म कारण होता है, ऐसा कहते है ।
वे यानी ब्रह्म चैतन्यस्वभाव से सर्वकारणत्व ओर ब्रह्मत्व को प्राप्त हुआ हे, पीछे संसार के
कारण होकर कर्म के निर्माण में होते हैं