Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
असौ तेजःकणोऽण्डाख्यः कल्पनात्कश्चिदण्डताम् ।
प्रयात्यन्तःस्फुरद्ब्रह्मा जलमापिण्डतामिव ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वकल्प में विराट में आत्मोपासना करने से संस्कृत हुए जीव को स्थूलसमण्टिरूप
हिरण्यगर्भता प्राप्त होती है, उससे अन्यको, व्यष्टि देहमे अहंभाव का संस्कार होने से,
व्यष्टिस्थूल देह में अहंभाव प्राप्त होता है, इस प्रकार अन्तर कहते है ।
जैसे जल जमने के कारण हिमरूप से तथा ओले के रूप से घनता (कठिनता) को प्राप्त
होता है, वैसे ही अण्डनाम को प्राप्त हुआ वह तेजःकण, जिसके अन्दर श्रीब्रह्मा विराजमान
रहते हैं, पूर्व जन्ममें मैं अण्ड हूँ, यों अण्डरूप से आत्मभावना करने से अण्डता को प्राप्त होता
हे