Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
यथा स्वतारकामार्गे व्योम्नः स्फुरति नीलिमा ।
शून्यस्याप्यस्य जीवस्य तथाहंभावभावना ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे दर्शक पुरुष द्वारा अपने नेत्रो के गोचर न होनेवाले आकाशभाग
में दौड़ाया गया नेत्र जहाँ तक पहुँच सकता हे, वहाँ तक नीलिमा नहीं देखता जहाँ पर पहुँच
कर आगे बढ़नेमें असमर्थ होता है, वहाँसे आगे उसका मार्ग नीला न होने पर भी उसे नीला
दिखाई देता है, वैसे ही अहन्ता से रहित भी जीवकी अपने अगोचर अपनी आत्मा में अहंभावना
होती है