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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

कश्चित्स्थावरतामेति कश्चिज्जंगमतामपि । कश्चिद्याति खचार्यादिरूपं संकल्पतः स्वतः ॥ २२ ॥ सर्गादावादिजो देहो जीवः संकल्पसंभवः । क्रमेण पदमासाद्य वैरिञ्चं कुरुते जगत् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

कोई पापी पुरुष अपने संकल्प से स्वयं वृक्ष आदि स्थावर योनिको प्राप्त होता है, कोई पशु-पक्षी आदि जंगम योनियों में प्राप्त होता है, कोई राक्षस, पिशाच आदि खेचर योनियों में जाता है, अपने संकल्पानुसार सबको स्वतः ही तत्‌-तत्‌ योनियाँ प्राप्त होती हैं । सृष्टि के आदि में प्रथम उत्पन्न ही ब्रह्मारूपी जीव, जिसकी सूक्ष्म देह समष्टिरूप उपाधि है ओर अपने संकल्प से ही जिसकी उत्पत्ति हुई है, क्रमश: विरंचिका पद प्राप्त कर अपने संकल्प से अण्ड के भीतर जगत्‌ की सृष्टि करता हे