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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

चिद्रूपस्यात्मतत्त्वस्य स्वाभाववशतः स्वयम् । मनाक्संवेदनमिव यत्तज्जीव इति स्मृतम् ॥ ११ ॥ तदेव घनसंवित्त्या यात्यहंतामनुक्रमात् । वह्न्यणुः स्वेन्धनाधिक्यात्स्वां प्रकाशकतामिव ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

चिद्घन जो आत्मतत्त्व है, उसका स्वयं अपने स्वरूप के अपरिज्ञान के कारण जो अल्पज्ञान-सा (ज्ञानस्वरूप की परिच्छिन्नता-सी) है, वही जीव नाम से पुकारा जाता है । जैसे अग्नि की चिनगारी अपने को उीप्त करनेवाले घी, तेल आदि की अधिकता से अपनी स्वाभाविक प्रकाशकता को प्राप्त होती है, वैसे ही वही जीव क्रमश: वासना की दृढतासे अहंकारता को प्राप्त होता है