Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verses 30–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 30,31
संस्कृत श्लोक
स्वकर्मभिस्ततो जन्ममृतिकारणतां गतैः ।
प्रयान्त्यूर्ध्वमधस्ताद्वा कर्म चित्स्पन्द उच्यते ॥ ३० ॥
चित्स्पन्दन भवति कर्म तदेव दैवं चित्तं तदेव भवतीह शुभाशुभादि ।
तस्माज्जगन्ति भुवनानि भवन्ति पूर्वं भूत्वा निजाङ्गकुसुमानि तरोरिवाद्यात् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
ऊपर (ऊँच योनियों में) या नीचे (नीच योनियो में) प्राप्त होते हैं चित् का जो स्पन्दन है,
वह कर्म कहलाता है। सारांश यह कि इस लोक में चित् का जो स्पन्दन (स्फुरण) है, वही
शुभाशुभरूप कर्म है, वही दैव भी कहलाता है और वही चित्त है। जैसे वृक्षसे उसके अवयवरूप
शाखा, पत्ते, फूल, फल आदि पहले उत्पन्न होकर फिर फिर होते हैं, वैसे ही कारणभूत ब्रह्म
से चित्स्पन्दरूप शुभाशुभकर्मवश भोक्तारूप प्राणियोंका समुदाय तथा उनके आधार और
भोग्य भुवनों की फिर-फिर उत्पत्ति होती है