Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
असदाभासमच्छात्म ब्रह्मास्तीह प्रबृंहितम् ।
बृहच्चिद्भैरववपुरानन्दाभिधमव्ययम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्यस्वरूप अविद्यासम्बन्धशून्य ब्रह्म में परमार्थद्वष्टि से जीवसत्ता का सम्भव नहीं है,
किन्तु अविद्यासंवलित ब्रह्म में जीवसत्ता होने में कोई विरोध नहीं है, इस प्रकार विभाग करके
कहने की इच्छा करनेवाले श्रीवस्रिष्ठजी पहले ब्रह्म के साधारण स्वरूप को कहते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, यहाँ पर विशुद्ध व्यापक ब्रह्म है, जिसमें
दवितप्रतीतिर्यौँ असत् हैं, जो असीम चैतन्यस्वरूप, अविनाशी ओर आनन्दस्वरूप है । एवं जो
आत्मज्ञानी नहीं है, उनके लिए उसका स्वरूप बड़ा भयंकर है । जैसे कि वृद्ध पुरुषों ने कहा
है - “अस्पर्शयोगो वै नाम दुर्दर्शः सर्व योगिनाम् । योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः ।”
(यह अस्पर्श योग सर्वयोगियों के लिए दुर्दर्श है, भयशून्य में भय देखनेवाले योगी इससे भयभीत
होते हैं)