Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verses 16–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verses 16–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 16-18
संस्कृत श्लोक
संकल्पोन्मुखता यातस्त्वहंकाराभिधः स्थितः ।
चित्तं जीवो मनो माया प्रकृतिश्चेति नामभिः ॥ १६ ॥
तत्संकल्पात्मकं चेतो भूततन्मात्रकल्पनम् ।
कुर्वंस्ततो व्रजत्येव संकल्पाद्याति पञ्चताम् ॥ १७ ॥
तन्मात्रपञ्चकाकारं चित्तं तेजःकणो भवेत् ।
अजातजगति व्योम्नि तारका पेलवा यथा ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्ति चित्त आदि भेद अहंभावाध्यासमूलक है, ऐसा कहते है ।
वही अहंकार संकल्पोन्मुख होकर अहंकाररूपसे रुद्र, चित्तरूप से विष्णु ओर जीवरूप
से ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध है तथा क्रमशः उनके (रुद्र आदि के) ही मन, माया, प्रकृति-ये
क्रियानाम हैं । उनमें संकल्पात्मक चित्त (ब्रह्मा) संकल्प से भूततन्मात्राओं की कल्पना करता
हुआ चेतनात्मक पूर्व अवस्था से अवश्य च्युत होता है ओर जड प्रपंचरूप होता हे । पंचभूत
तन्मात्रता को प्राप्त हुआ वह चित्त ब्रह्मा) तेजःकण बन जाता हे । ब्रह्मभाव से अत्यल्प होने
के कारण उसे कण कहा है । जिसमें अभी जगत् उत्पन्न नहीं हुआ ऐसे आकाश में वह तेजःकण
मन्द प्रकाशवाले तारे के सदृश प्रतीत होता हे