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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । योऽयं सर्वगतो देवः परमात्मा महेश्वरः । स्वच्छः स्वानुभवानन्दस्वरूपोऽन्तादिवर्जितः ॥ १ ॥ एतस्मात्परमानन्दाच्छुद्धचिन्मात्ररूपिणः । जीवः संजायते पूर्वं स चित्तं चित्ततो जगत् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जो यह घट-घटव्यापी स्वयंप्रकाश, कारणों का भी कारण, महामहिमाशाली, विशुद्ध, जन्म ओर विनाश से रहित आत्मज्ञानान्दरूप परमात्मा है, शुद्ध चैतन्यस्वरूपी इसी परमात्मानन्द से “अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" इस श्रुति से नामरूपविस्पष्टकरणरूप जगत्‌-सृष्टिसे पहले जीवोपाधि लिंगसमष्टि की उत्पत्ति से जीव उत्पन्न होता है, वही उपाधि की प्रधानता से चित्त कहलाता है, उससे यह जगत्‌ उत्पन्न हुआ है

सर्ग सन्दर्भ

तिरसठवाँ सर्ग समाप्त चौसठवाँ सर्ग भोग्य की विचित्र शक्तियों के आविभाव का निरूपण तथा भोक्ता की जीवत्वप्राप्ति के क्रम का वर्णन ।