Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
स्वानुभूतिप्रमाणेऽस्मिन्ब्रह्मणि ब्रह्मबृंहिते ।
कथं सत्तामवाप्नोति जीवको द्वैतवर्जिते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
अखण्ड अद्वितीय स्वप्रकाश ब्रह्म मे सखण्ड सद्वितीय जीवसत्ता कैसे उत्पन्न हो सकती
हैं, इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी शका करते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, ब्रह्म होने के कारण अत्यन्त अपरिच्छिन्नतारूप वृद्धि
को प्राप्त, स्वानुभव से वेद्य अद्वितीय ब्रह्म में छोटा-सा जीव पूर्वसिद्ध ब्रह्मता से विरुद्ध पृथक्
सत्ता को कैसे प्राप्त होता है ?