Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
संकल्पः कलनाबीजं तदात्मैव हि जीवकः ।
कर्म पश्चात्तनोत्युच्चैरुत्थायाकर्मतः क्रमात् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
लोक में देखा जाता है कि जो कोई कर्म करता है, वह पहले संकल्प करता है, तदुपरान्त
व्यापार से घट आदि की रचना करता है, इससे पूर्वोक्त क्रम की सिद्धि में को भी सन्देह नहीं
हो सकता, इस अभिप्राय से कहते हैं।
किसी कल्पना (रचना) का मूल कारण संकल्प है, संकल्प के बिना रचना हो ही नहीं
सकती, इसलिए आत्मा ही जीव बनकर निष्क्रिय (निर्व्यापार) आत्मासे क्रमशः पृथक् होकर
कर्म करता है