Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verses 8–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणः स्फुरणं किंचिद्यदवाताम्बुधेरिव ।
दीपस्येवाप्यवातस्य तं जीवं विद्धि राघव ॥ ८ ॥
शान्तत्वापगमेऽच्छस्य मनाक्संवेदनात्मकम् ।
स्वाभाविकं यत्स्फुरणं चिद्व्योम्नः सोऽङ्ग जीवकः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् की विचित्रता की कल्पना के अनुरूप क्रियाशक्तिप्रधान प्राण बनना ही चित् का
जीवभाव है, इसमें द्रष्टान्त देते हैं ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, निर्मल चिदाकाश का प्राणाधीन चलनाध्यास होने से स्वाभाविक
निष्क्रियता के छिप जानेपर जो अल्पसंवेदन यानी परिच्छेद भ्रान्ति (अहम्) उदित होता है,
वही जीव है